Mughal E Azam (5-8-1960) hindi movie
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फ़िल्म :-'मुग़ल-ए-आज़म'
दिनांक:-5 अगस्त 1960, 12 नवंबर 2004 (रंगीन)
अवधि:-191 मिनट
भाषा:-उर्दू, तमिल और अंग्रेजी
प्रसिद्ध चरित्र :- अकबर, सलीम, अनारकली, महारानी जोधा बाई
पुरस्कार फिल्मफेयर:- सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ छायाकार पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ संवाद
बजट:-1.5 करोड़
डायरेक्टर . के. आसिफ़
निर्मिता:-शापूरजी पल्लोनजी
कलाकार:- पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, मधुबाला, दुर्गा खोटे
संपादन:-धर्मवीर
संगीत:-नौशाद
गीतकार:-शकील बदायूंनी
गायक:- गुलाम अली खान, मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, शमशाद बेगम
प्रसिद्ध-गीत:-जब प्यार किया तो डरना क्या
संक्षेप:-मुग़ल-ए-आज़म’
‘मुग़ल-ए-आज़म’ हिंदुस्तान की सबसे पहली फ़िल्म थी, 5 अगस्त 1960 में एक ऐसी फिल्म बन गई थी जो अब भी पुरानी नहीं लगती है। फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' को बनाने के लिए जिस पागलपन, दम और साधना की ज़रूरत थी, वो तो के. आसिफ़ में कूट-कूट कर भरी हुई थी | छोटी-छोटी चीज़ को ध्यान से देखने की कला रखने वाले फ़िल्म की जान थी के. आसिफ़ साहब |सिगरेट या सिगार की राख चुटकी से झाड़ने वाले करीमउद्दीन आसिफ़ अभिनेता नज़ीर के भतीजे थे ।के. आसिफ़ ने अपने जीवन काम में दो ही फ़िल्मों का निर्देशन किया, एक 1944 में आई 'फूल' और दूसरी 'मुग़ल-ए-आज़म.' लेकिन इन दो ही फ़िल्मों का निर्देशन करने के बावजूद भी फ़िल्मों जगत के इतिहास में . के. आसिफ़ का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा ।किताब 'ये उन दिनों की बात है' के लेखक यासिर अब्बासी कहते हैं, कि फिल्म "मुग़ल-ए-आज़म कम से कम मैं 100 बार देख चुका हूँ॥
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'मुग़ल-ए-आज़म'
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पृथ्वीराज कपूर (बादशाह अकबर ) की दमदार आवाज, दिलीप कुमार (सलीम) की विद्रोही शख्सियत. मधुबाला(अनारकली) की दिलकश हरकतें, नौशाद साहब का संगीत,अधिकांश लता मंगेशकर जी द्वारा गाए गए गीत ।फिल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' में सब कुछ खास था ।"जब प्यार किया जाता है, तो डरना क्या" गीत पर नाचती अनारकली को भला कौन भूल सकता है। यूँ तो फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' को दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाने में फ़िल्म का हर पक्ष मज़बूत है । लेकिन फ़िल्म को दर्शकों के बीच बहुत लोकप्रिय बनाने में संवादों ने बड़ी भूमिका निभाई थी ।
फिल्म "मुगल-ए-आज़म" से जुड़े कुछ आश्चर्यजनक तथ्य:-
रिपोर्टों के अनुसार फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' अपने समय में सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म थी। जिसने लगातार 15 वर्षों तक ये रिकॉर्ड बनाए रखा।
अपने ज़माने की सबसे मंहगी और सफल फ़िल्म "मुग़ल-ए-आज़म" के निर्देशक के. आसिफ़ एक किराए के मकान में रहे और टैक्सी पर चल कर फिल्म को पूरा किया ।
फिल्म से जुड़ी अनेकों दिलचस्प बातॊं में से एक दिलचस्प बात ये भी है कि फिल्म की शूटिंग देखने के लिए कई बड़े लोग मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ,चीन के प्रधानमंत्री चू एन लाई,और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सेट पर पहुंचते थे ।
फिल्म में स्क्रीन पर तानसेन को गाते हुए दिखाने के लिए बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ को एक गाने के लिए 25000 रुपये देकर मनाया गया था । जब कि उस समय लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी (चोटी के गायकों) को एक गाने के लिए 500 से 1000 रुपये ही दिए गए थे ।
कहा जाता है फिल्म के कलाकारों के वस्त्रों की सिलाई के लिए दर्जी दिल्ली से लाए गए थे । मुकुटो का डिजाइन कोहलपुर के कारीगरों ने किया था , अस्त्र-शस्त्र राजस्थान से तैयार करवाए गए थे और कलाकारों के लिए आभूषण हैदराबाद के सुनार से बनवाए गए थे ।
आगरा से सम्राट अकबर (पृथ्वीराज कपूर) के लिए बहुत महंगे जूते खरीदने पर निर्मिता शापूरजी पल्लोनजी ने कहा कि आसिफ साहब इतने महंगे जूतों ने कौण सा कैमरे मे आना है तो आसिफ साहब ने कहा कि महंगे जूते पहनने से मेरे अकबर (पृथ्वीराज कपूर) के मुख पर जो गरुर , जो जलाल होगा, मैं उस को कैमरे मैं कैद करना चाहता हूं ।
फिल्म मे फिल्माए गए एक सीन में जिसमें जोधाबाई भगवान कृष्ण से प्रार्थना कर रही है वो भगवान कृष्ण की प्रतिमा सोने की बनी थी।
सलीम और अकबर के बीच फिल्म में दिखाए गए युद्ध दृश्य के लिए, 8000 सैनिक ( कुछ भारतीय सेना के सैनिक), 2000 ऊंट,5000 घोड़ों को लिया गया था |
हिंदी, तमिल और अंग्रेजी संवादों के लिए सही ढंग से होंठों को चलाने के लिए फिल्म को तीन बार शूट किया गया है ।
कथित तौर पर अनारकली की भूमिका पहले सुरैया को दी गई थी लेकिन बाद में ये मधुबाला की झोली में चली गईं जिसने मधुबाला का नाम बॉलीवुड में सुनेहरी हरफों में लिख दिया ।
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जब प्यार किया तो डरना क्या |
जानकर कहते हैं कि जयपुर के जिस आमेर के किले में ‘प्यार किया किया तो डरना क्या गीत को फ़िल्माया गया था वहां का शीशमहल काफ़ी छोटा है । वास्तव में उस तरह के मुग़ल रानियों के गुसलखाने हुआ करते थे । इसलिए शीशमहल का एक नया सेट लगवाया गया था जिस को बनाने में दो साल लगे थे।
उस समय़ फिल्म को बनाने में अनेकों मुश्किलों में से के आसिफ़ के लिए एक बड़ी मुश्किल ये भी थी कि मधुबाला के पिता अताउल्लाह ख़ाँ फ़िल्म की शूटिंग के दौरान सेट पर मौजूद रहते थे । जिसके तहत मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच प्रेम दृश्य फ़िल्माए जाना मुश्किल था । लेकिन जब के आसिफ़ को पता चला कि मधुबाला के पिता रमी खेलने के शौक़ीन हैं तों उन्होंने अपने पत्रकार तारकनाथ गांधी को कुछ हज़ार रुपए दे कर कहा कि आज से आप का काम अताउल्लाह ख़ाँ साहब के साथ रमी खेलना और उनसे जानबूझ कर हर बाज़ी हारना है ।
फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' को मिली प्रशंसा में 8 फिल्मफेयर पुरस्कार में, तीन फिल्मफेयर पुरस्कार और एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार शामिल हैं।

फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' की कहानी :-
औलाद की चाह में बादशाह जलालुद्दीन अकबर आगरा से चलकर ग़रीब नवाज़ मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर पैदल चल कर अजमेर जाता है । जिसकी इनायत से बादशाह अकबर की बेग़म जोधा भाई को एक बेटा होता है जिसका नाम सलीम रखा जाता है । जो नौकरानी अकबर को बेटा होने का पैगाम देती है , बादशाह सलामत उसे अपने गले से मोतियों का हार बतौर शुकराना देते हैं और साथ में कभी भी कोई भी ख्वाहिश मांगने का बचन देते हैं । आगे चलकर उसी नौकरानी की बेटी अनारकली बनती है जिससे सलीम को मुहब्बत हो जाती है । बादशाह को ये मुहब्बत
ना मंजूर होती है और सलीम को बादशाह अकबर की बात नामंज़ूर होती है जिस के तहत बाद शाह अकबर और सलीम में जंग होती है जंग में सलीम हार जाता है और कैद कर लिया जाता है और अनारकली को भूल जाने पर ही उसे ही माफ़ी देने की बात होती है ।
उधर जब बादशाह अनारकली को मौत की सज़ा की तौर पर जिंदा दा दीवार में चुनवा देने की बात करता है । अनारकली की मां अकबर को अपना दिया गए बचन की याद दिलाती है और अनारकली को छोड़ देने की बात करती है।
अपने दिए गए बचन याद करके अकबर अनारकली को छोड़ देता है और मां-बेटी को कहीं दूर गुमनामी की जिंदगी की ओर धकेल देता है ।
अनारकली और सलीम की मुहब्बत पर बनी फिल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' की कहानी एक कल्पना है या हकीक़त जो भी है सो है मगर करीमुद्दीन आसिफ़ के ज़ज्बे को सलाम है जिसकी 16 साल कॊई मेहनत ने फिल्म के हर दृश्य में जान डाल दी ।
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